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Tenali Raman And Krishnadevaraya Story – देशद्रोह का आरोप

Tenali Raman And Krishnadevaraya Story - देशद्रोह का आरोप

Tenali Raman And Krishnadevaraya Story

तेनालीरामा की कहानी : देशद्रोह का आरोप

राज कृष्णदेव राय के दरबार में तेनालीरामा का विशेष मान सम्मान हुआ करता था। इसलिए महल में अधिकतर लोग उनसे जलते थे। एक बार विजयनगर राज्य की स्थिति अच्छी नहीं थी।

विजयनगर पर पड़ोसी देश द्वारा हमला किए जाने का खतरा था। एक दरबारी ने इस समय का फायदा उठाकर महाराज को तेनालीरामा के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया।

एक शाम महाराज बगीचे में बैठे प्रकृति को निहार रहे थे यह देखकर एक दरबारी वहाँ पहुँच गया। वह बहुत ही कुटिल व्यक्ति था।

वह महाराज से बोला की महाराज अगर आप क्रोधित न हों तो मैं आपको एक बात कहने की अनुमति चाहता हूं। राजा ने क्रोध न करने का आश्वासन दिया।

तब दरबारी ने कहा कि तेनालीरामा पड़ोसी राज्य को विजयनगर की सारी गुप्त बाते बताता है वह सही व्यक्ति नहीं है महाराज।
महाराज ने जैसे ही ये बातें सुनी उनके गुस्से का ज्वालामुखी उस दरबारी पर फुट पड़ा और महाराज बोले,

“मूर्ख तुम जिस तेनालीरामा के बारे में इस तरह की बात कर रहे हो वह विजयनगर का सबसे उत्तम व्यक्ति है। तुम्हें तो ऐसा सोचते हुए भी लज्जा आनी चाहिए।”

दरबारी ने कहा,

“यह सच नहीं है महाराजा, आपने अपनी आंखें मूंद ली हैं। इसलिए आप उसकी कोई भी चाल नहीं देखते हैं, लेकिन मुझे निश्चित रूप से पता है।”

जब दरबारी ने इतने आत्मविश्वास के साथ कहा, तो राजा को भी तेनालीरामा पर थोड़ा संदेह होने लगा।

राजा ने उसी घड़ी तेनालीरामा को बुलावा भेजा जैसे ही तेनालीरामा महल पहुँचा तो राजा ने उससे पूछा,

“क्या तुम पड़ोसी राज्य के गुप्तचर हो?” तेनालीरामा को महाराजा से इस सवाल की उम्मीद नहीं थी। तेनालीरामा इसका जवाब नहीं दे सका और रोने लगा। राजा ने कहा,

“तुम्हारी चुप्पी हम क्या मतलब निकालें अर्थात जो हमने सुना है वही सच है।” तेनालीरामा ने कहा,

“महाराज मैं आपसे कुछ नहीं कह सकता। आप मुझ से अच्छी तरह से परिचित हैं, इसलिए आपकी हर आज्ञा का मैं अवश्य पालन करूंगा।”

यह सुनकर महाराज कृष्णदेव क्रोधित हो गए और कहा, “जाओ विजयनगर राज्य छोड़ कर उस राजा के साथ रहो, जिसे तुम चापलूसी करते हो।”

तेनालीरामा ने जब राजा के मुंह से एसी कठोर बातें सुनी वह वहाँ से चला गया। वह पड़ोसी राजा के दरबार में गया और उसकी प्रशंसा में कई गाने गाए।

तेनालीरामा की प्रशंसा से पड़ोसी राज्य का राजा बहुत खुश हुआ और उसे उसका परिचय देने के लिए कहा। तेनालीरामा ने कहा,

” राजा कृष्णदेवराय जो विजयनगर के राजा हैं मैं उनका निजी सचिव हूं।”

राजा ने कहा, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुये हमारे दरबार में आने की। कृष्णदेवराय हमारा शत्रु है, क्या तुम्हें हमसे भाय नहीं लगता?” तेनालीरामा ने कहा,

“आप विजयनगर को अपना दुश्मन मानते हैं, जबकि हमारे महाराज कृष्णदेवराय आपके लिए ऐसी भावना नहीं रखते हैं, वे आपको मित्र मानते हैं।”

पड़ोसी राजा ने आश्चर्य चकित होते हुए कहा, “हमारे तो सुना है कि विजयनगर के राजा हमे अपना दुश्मन समझते हैं।” तेनालीरामा ने कहा,

“मेरे राज्य के दरबारियों ने भी महाराज को उकसाने की कोसिस की, लेकिन हमारे राजा उनकी बातों को नहीं सुनते। महाराज कृष्णदेव तो आपकी बहुत प्रशंसा करते हैं।

वह कहते हैं कि पड़ोसी से मित्रता ही भली, दुश्मनी रखना सही बात नहीं है।” तेनालीरामा की बातों ने पड़ोसी राजा का मन मोह लिया। उन्होंने कहा,

“आप ठीक कहते हैं, लेकिन हम आपका कहा कैसे मान लें?” तेनाली राम ने कहा,

“मुझे खुद राजा कृष्ण देव राय ने आपके पास मित्रता का प्रस्ताव लेकर भेजा है और मैं खुद उनका निजी सचिव हूँ।”

पड़ोसी राजा तेनालीरामा के कायल हो गए और कहा, “तो हमें आगे क्या करना चाहिए?”
तेनालीरामा ने सलाह दी कि उन्हें एक संधि प्रस्ताव और कुछ उपहार विजयनगर साम्राज्य तक पहुँचना चाहिए और विजयनगर के साथ दोस्ती स्वीकार करनी चाहिए।

राजा को तेनालीरामा का सुझाव बहुत पसंद आया। उसने उपहार तैयार करना शुरू कर दिया।

दूसरी ओर राजा कृष्णदेव राय को तेनाली राम की मासूमियत के बारे में पता चला और उन्हें अपने व्यवहार पर बहुत पछतावा हुआ।

अगले दिन उसने देखा कि तेनालीरामा और पड़ोसी राजा के दूत संधि का प्रस्ताव लेकर दरबार में मौजूद थे। उनके साथ कई उपहार भी थे। राजा ने तेनालीरामा को प्यार से देखा।

उनके मन में यह विश्वास था कि केवल तेनालीरामा ही दुश्मनी को दोस्ती में बदलने का काम कर सकता हैं।

Tenali Raman And Krishnadevaraya Story से हमने क्या सीखा:

इस Tenali Raman And Krishnadevaraya Story से यह पता चलता है कि हमें किसी के बहकावे में नहीं आना चाहिए। कही सुनी बातों पर भरोसा करने से पहले हमने एक बार खुद से जरूर विचार कर लेना चाहिए।   

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